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धर्म के पूर्वजों का वज्द

 धर्म के पूर्वजों का वज्द

 

निष्कर्ष यही है के ऐसे सोंच-विचार पैदा हों, क्यों के जो हालत आदमी पर ग़ालिब होती है इ के आसार का प्रकटन में आना अवश्य है।  देखीए किसी प्रकार की हालत का जब ग़लबा हो जाता है तो मनुष्य आत्महत्या कर लेता है हालांकि मानव जाति के स्वभाव की अपेक्षा है के अपनी जान बचाने की तदबीरें करें। 

 

परन्तु ग़ल्बा हाल इस स्वभाव की अपेक्षा पर भी प्रभावित आ जाता है।  शरअ शरीफ ने भी इस हालत की रिआयत रखी है।  अर्थात इज़ेरार में मुरदार खाना श्रेष्ठ हो जाता है। 

 

परन्तु इसी हद तक के जिस से वह हालत रफअ हो, इसी कारण से कुछ लुक़मों के बाद जब वह हालत बाखी ना रहे तो मुरदार जो अवश्यकता के रूप से हलाल हो गया था फिर मुरदार हो जाएगा।  यहीँ से खियास हो सकता है के धर्म के पूर्वज व बुज़ुर्गाने दीन पर जब समाअ आदि में सच्ची हालत वज्द तारी होती है तो कुछ कथन व हरकतें इन से ऐसे प्रदर्शन होते हैं जो शरन व बुद्धि के अनुसार से जायज़ होते हैं, परन्तु क्यों के वह सच्ची हालत होती है इस लिए वह मअज़ूर समझे जाते हैं। 

 

{मक़ासिद उल इस्लाम, जिल्द 08, पः 107}


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