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  NS1: 528   
तहयतुल मसजिद पढ़ने की दुसरी कैफियत

  NS1: 527   
नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मधुर बाल

  NS1: 526   
नूरे-मुसतफा सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम की उत्पत्ति

  NS1: 525   
क़ुरान में नमाज़ का आदेश

  NS1: 524   
पायजामे या तेबंद टखनों से नीचे लिटाए हुए नमाज़ पढ़ने की वईद व चेतावनी

  NS1: 383   
हसद के विनाश-

  NS1: 467   
बीवी के लिए अल्लाह के बाद आज्ञापालन में पति का दर्जा है-

  NS1: 523   
हज़रत सफवान की पत्नी की हुज़ूर की सेवा में अपने पति की शिकायत और इस पर हुज़ूर का निर्णय

  NS1: 522   
पैगम्बर - निर्माण के मार्ग-दर्शक

  NS1: 521   
पसंदीदा फक़्र व गरीबी

 
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संवाद सविस्तार
   
  शिर्क क्षमा के सुपात्र नहीं
   
 

 शिर्क क्षमा के सुपात्र नहीं

 

पैगम्बर व उम्मत के सालिहीन (धर्मनिष्ठ) के सम्मान को मुशरिकीन की बुत परस्ती को जोड़ कर मुसलमानों को मुशरिक ठहराते हैं।  तथा दलील में ये आयत पाक पेश की जाती हैः-

 

भाषांतरः और जिन्हों ने अल्लाह तआला के सिवा वाली (समर्थक और संरक्षक) बना लिए (और केहते हैं) हम इन (बुतों) की इबादत केवल इस लिए करते हैं के वह हमें अल्लाह तआला का सामीप्य प्राप्त करा दे। 

 

(सुरह अज़ ज़ुमरः 39:03) 

 

ये क़ुरान पाक की धन्य आयत जो के मुशरिकीन के बारे में प्रकट हुई इस से दलील करते हुए कहा जाता है के पैगम्बर किराम व बुज़ुर्गान दीन को अल्लाह तआला के दरबार में नज़दीकी का माध्यम जानने से शिर्क अनिवार्य आता है। 

 

इस आयत पाक से पैगम्बर व धर्मनिष्ठ लोगों के सम्मान के अदम जवाज़ पर दलील करना ही अनुचित है।  क्यों के मुशरिकीन, बुत्तों को नज़दीकी व तक़र्रुब का माध्यम जानते हुए उन की इबादत करते थे तथा कोई मुसलमान चाहे वह देहात का रेहने वाला ही क्यों ना हो वह किसी नबी या वली की इबादत नहीं करता बल्कि उन का सम्मान व आदर करता है। 

 

मुसलमान- केवल अल्लाह तआला की इबदत करता है तथा पैगम्बर व ऑलिया का सम्मान करता है।  सम्मान और चीज़ है और इबादत और।  सम्मान को इबादत घोषित दे कर मुसलमानों को मुशरिक केहना अन्याय तथा हद से आगे बड़ जाना है। 

 

सहीह बुखारी में रिवायत के हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, इन लोगों निर्माण में सब से दुष्टतर लोग घोषित देते हैं जो मुशरिकीन के बारे में प्रकट होने वाली आयतों को मुसलमानों से जोड़ देते थे।  इस मौक़े पर मुफती साहब ने क़ुरान करीम की कई आयतों से तौहीद और शिर्क के बीच अंतर को स्पष्ट किया।  उन्हों ने कहा के यदि केवल शब्द के एकसा से शिर्क अनिवार्य आता है तो फिर प्रश्न ये पैदा होगा के हर मनुष्य की आत्मा व रूह अपने आप को जीवित केहता है तथा अल्लाह तआला को भी हैई व क़ैयुम मानता है। 

 

जब अल्लाह तआला को हैई जीवित मानता है तो क्या मनुष्य को भी हैई जीवित केहने से क्या शिर्क अनिवार्य आएगा? 

 

सुरह आले इमरान की 49 आयत के हवाले से कहा के अल्लाह तआला ने हज़रत ईसा अलैहिस सलाम से संबंधित फरमाया के वह अपनी क़ौम के बीच घोषणा करेंगे के अल्लाह तआला ने उन्हें बनी-इसराईल की ओर रसूल बना कर भेजा है, मैं तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारे मुअजज़े ले कर आया हुँ, मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से पक्षी के जैसे सूरत बनाता हुँ, फिर इस में फूंकता हुँ तो वह अल्लाह तआला के आदेश से तुरंत पक्षी हो जाता है तथा मैं मादर ज़ाद अँधे और कोढ़ के रोगी को स्वस्थ्य कर देता हुँ तथा अल्लाह तआला के आदेश से मृतक को जीवित कर देता हुँ एवं मैं तुम्हें वह बतलाता हुँ जो तुम खाते हो और जो कुछ अपने घरों में जमा कर के रखते हो, निश्चय इन मुअजज़ों में तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है यदि तुम ईमान रखते हो। 

 

(सुरह आले इमरानः 03:49) 

 

जिस प्रकार आज कुछ लोग शिर्क का व्याख्या व परिभाषा करते हैं इस से हज़रत ईसा अलैहिस सलाम के कथन तथा क़ुरानी आयतों पर विरोध लागू होगा के इन में शिर्क की दावत व निमन्त्रण है, हालांकि क़ुरान करीम शिर्क का खात्मा व अंत करने वाला है तथा पैगम्बर तौहीद के दाई (निमन्त्रण देने वाले) होते हैं।

   
 
 
 
 
 
 
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