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  NS1: 528   
तहयतुल मसजिद पढ़ने की दुसरी कैफियत

  NS1: 527   
नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मधुर बाल

  NS1: 526   
नूरे-मुसतफा सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम की उत्पत्ति

  NS1: 525   
क़ुरान में नमाज़ का आदेश

  NS1: 524   
पायजामे या तेबंद टखनों से नीचे लिटाए हुए नमाज़ पढ़ने की वईद व चेतावनी

  NS1: 383   
हसद के विनाश-

  NS1: 467   
बीवी के लिए अल्लाह के बाद आज्ञापालन में पति का दर्जा है-

  NS1: 523   
हज़रत सफवान की पत्नी की हुज़ूर की सेवा में अपने पति की शिकायत और इस पर हुज़ूर का निर्णय

  NS1: 522   
पैगम्बर - निर्माण के मार्ग-दर्शक

  NS1: 521   
पसंदीदा फक़्र व गरीबी

 
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संवाद सविस्तार
   
  हसद के विनाश-
   
 

 हसद के विनाश

 

हदीसः हज़रत रसूल उल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आदेश करते हैं- 3 गुण व स्वरूप ऐसे हैं के सब पापों की बुनियाद हैः (1)- घमण्ड व अभिमान।  (2)- लालच।  (3)- हसद व जलन। 

 

हासिद की उम्र भी कम होती है।  किसी ने एक बद्दू से पूछा के तुम्हें लम्बी उम्र कैसे हाथ आई?  उत्तर दिया केः मैं ने हसत को छोड़ दिया तथा इतनी उम्र पाई।  जब अल्लाह तआला चाहते हैं के किसी पर ऐसा विरोधी व शत्रु आए जो कभी इस पर रहम व कृपा ना करे तो हसद को इस के पीछे लग देते हैं। 

 

हज़रत शैख़ रिसलान दमिश्की रहमतुल्लाहि अलैह फरमाते हैः हसद हर शर (बुराई) की कुँजी है, अनेक फितने इसी के कारण प्रकट होते हैं, तथा हासिद धार्मिक व सांसारिक उन्नति से महरूम व वंचित हो जाता है। 

 

अल्लाह तआला की राह के सालिकों को चाहिए के बुरी आदतों से कोसों दूर भागें तथा अपने दिल की इस प्रकार सुरक्षा करें के सच्चाई ये है के महसूद को जो नेमतों मिली हैं इन के देने वाले अल्लाह तआला हैं। 

 

हज़रत मुहम्मद इब्न सिर्रीँ रहमतुल्लाहि अलैह फरमाते हैं के मैं सांसारिक मामलात में किसी से हसद नहीं किया, इस लिए के यदि वह व्यक्ति जितनी है तो उसे जन्नत ही मिलेगी इस के मुक़ाबले में संसार की नेअमतों की किया सच्चाई है, तथा यदि दोज़खी है तो दोज़ख़ की आग में चिलेगा मेरे हसद करने का इस पर क्या प्रभाव व असर होगा। 

 

ऐसे ही बदज़नी, ग़ैज़ व ग़ज़ब, कीना व अदावत (द्वेष, घृणा, बुरे सोंच व विचार) भी नफ्स के बुरे गुण हैं।  सालिकों का दिल इन से पवित्र व शुद्ध होना चाहिए।  ज़िक्र का असर उसी समय होता है जब के सालिक का दिल इस कचरे कोड़े से पवित्र व शुद्ध हो। 

 

 

{मवाईज़ हसना, जिल्द 02, पः 139-141}

 

   
 
 
 
 
 
 
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