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  NS1: 528   
तहयतुल मसजिद पढ़ने की दुसरी कैफियत

  NS1: 527   
नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मधुर बाल

  NS1: 526   
नूरे-मुसतफा सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम की उत्पत्ति

  NS1: 525   
क़ुरान में नमाज़ का आदेश

  NS1: 524   
पायजामे या तेबंद टखनों से नीचे लिटाए हुए नमाज़ पढ़ने की वईद व चेतावनी

  NS1: 383   
हसद के विनाश-

  NS1: 467   
बीवी के लिए अल्लाह के बाद आज्ञापालन में पति का दर्जा है-

  NS1: 523   
हज़रत सफवान की पत्नी की हुज़ूर की सेवा में अपने पति की शिकायत और इस पर हुज़ूर का निर्णय

  NS1: 522   
पैगम्बर - निर्माण के मार्ग-दर्शक

  NS1: 521   
पसंदीदा फक़्र व गरीबी

 
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संवाद सविस्तार
   
  रमज़ान कि शिक्षा फिक्र व कर्म कि सुरक्षा का माध्यम
   
 

 रमज़ान कि शिक्षा फिक्र व कर्म कि सुरक्षा का माध्यम

 

पावन रमज़ान कि इस विशाल रूहानी शिक्षा के बाद कल क़यामत के दिन कोई व्यक्ति तकलीफ नहीं कर सकेगा के नफ्स व शैतान के छल व कपट में आकर हम पाप कर बैठे हैं।  क्यों के एक माह कि शिक्षा में शैतान को क़ैद कर दिया गया तथा रोज़ों के द्वारा नफ्स कि इसलाह व सुधराव की गई। 

 

क़ुरान करीम कि तिलावत तथा तरावीह के द्वारा रूहानी शक्ति में अधिकता कर दिया गया।  जिस प्रकार देश कि सुरक्षा के लिए सेना तैयार कर के सीमांत (सरहद) पर कढा किया जाता है ताकि विरोधी देश में प्रवेश ना हो।  

 

इसी प्रकार का इ़मान का देश जो नेक व भले कर्म के द्वारा आबाद है इस कि सुरक्षा के लिए मानव को रूहानी शिक्षा की गई तथा इसे --- कर दिया गया के कहीं शैतान इस के इ़मान व विश्वास (अखीदे) तथा नेक कर्म को बरबाद व विनाश ना कर सके। 

 

रमज़ान के बाद भी हमें नेक कर्म करते हुए तक़वा तहारत वाला जीवन बसर करना अनिवार्य है तथा प्रिय शरीअ़त के हर आदेश पर अभिनय करना अवश्य है।  क्यों के हज़रत नबी करीम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम जो अ़मल फरमाते हमेशां इस पर हमेशां करते थे तथा इस कर्म को छोडना नहीं फरमाते।  आप का कर्म किसी ज़माना या काल पर घेरा हुआ नहीं होता।  जैसा के सहीह बुखारी व सहीह मुसलिम शरीफ आदि में हदीस पाक हैः-

 

भाषांतरः- हज़रत अ़लखमा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा से वर्णित है, इन्हों ने फरमायाः मैं ने उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दिखा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा से पूछा करते हुए निवेदन कियाः ऐ उम्मुल मोमिनीन!  हज़रत रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम का मुबारक अ़मल कैसा हुआ करता, कया आप (सल्लल्ल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम) (अ़मल व कर्म के लिए) कुछ दिन विशेष फरमाया करते थे?  हज़रत उ़म्मुल मोमिनीन ने फरमायाः नहीं!  आप (सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम) अ़मल मुबारक हमेशा हुआ करता, तुम में कौन इस प्रकार अ़मल कर सकता है?  जिस प्रकार हज़रत रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम ने किया हो। 

 

(सहीह मुसलिम, हदीस संख्याः 1865, सहीह बुखारी हदीस संख्याः 1981) 

 

मुसलमान कि प्रतिष्ठा के रूप हमारी ज़िम्मेदारी है के हम अल्लाह तआ़ला तथा इस के रसूल करीम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के अहकाम पर अ़मल पैरा हैं।  पाँच समय कि नमाज़ जमात के साथ पढने का प्रबंध करें। 

 

क़ुरान करीम कि तिलावत करें, माता-पिता कि सेवा करें।  ग़रीबों व दरिद्र का ख्याल रखें।  निर्धन व रहित लोग कि मदद करें।  अल्लाह के अधिकार व इ़बाद के अधिकार का समापन में सुस्ती व आलस्य ना करें। 

 

अल्लाह कि बारगाह में दुआ़ करें के अल्लाह तआ़ला रमज़ान के महिने कि तरह साल भर हमें अपनी रहमतों व दयालुता के साये में इ़बादत व बन्दगी में व्यस्त रखे।  आज्ञापालन कि मार्गदर्शन दान फरमाएं।  पापों के अभियुक्त, शैतान के छल व कपट से बचाए।  अपने हबीब पाक अलैहिस सलाम के संरक्षण में हमें अवज्ञा से दूर रखे। 

 

नेक व भले कर्म करने कि मार्गदर्शन प्रदान फरमाए तथा हर शर से सावधान व सुरक्षित रखे।

   
 
 
 
 
 
 
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