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  NS1: 528   
तहयतुल मसजिद पढ़ने की दुसरी कैफियत

  NS1: 527   
नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मधुर बाल

  NS1: 526   
नूरे-मुसतफा सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम की उत्पत्ति

  NS1: 525   
क़ुरान में नमाज़ का आदेश

  NS1: 524   
पायजामे या तेबंद टखनों से नीचे लिटाए हुए नमाज़ पढ़ने की वईद व चेतावनी

  NS1: 383   
हसद के विनाश-

  NS1: 467   
बीवी के लिए अल्लाह के बाद आज्ञापालन में पति का दर्जा है-

  NS1: 523   
हज़रत सफवान की पत्नी की हुज़ूर की सेवा में अपने पति की शिकायत और इस पर हुज़ूर का निर्णय

  NS1: 522   
पैगम्बर - निर्माण के मार्ग-दर्शक

  NS1: 521   
पसंदीदा फक़्र व गरीबी

 
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संवाद सविस्तार
   
  हज़रत सई़द रज़ियल्लाहु तआला अन्हु कि इस्तेखामत
   
 

 हज़रत सई़द रज़ियल्लाहु तआला अन्हु कि इस्तेखामत

 

धर्म के पूर्वजों के जीवन से रोशनी प्राप्त करें के इन तक़वा किस कमाल को पहंचा हुआ था।  धर्म पर इन कि इस्तेखामत (अटल व स्थिर) कैसी थी, हज़रत सई़द बिन मुस्सैब रज़ियल्लाहु तआला अन्हु एक विशाल व प्रधान ताबई़ गुज़रे हैं। 

  

जिन्हें सैयुद ताबई़न के लखब (शीर्षक व उपाधि) से दुनिया याद करती है।  उन के हालात वर्णन करते हुए इ़माम अबु नई़म अस्फहानी ने हुलयतुल ऑलिया में वर्णन किया हैः-

 

भाषांतरः- हज़रत अ़बदुल मुनई़म बिन इद्रीस अपने पिता से वर्णित करते हैं, इन्हों ने फरमायाः हज़रत सई़द बिन मुसैयब रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने 50 वर्ष तक इ़शां के वुज़ू से नमाज़ फज्र अदा फरमाई तथा हज़रत सई़द बिन मुसैयब रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का वर्णन है के इन्हों ने फरमायाः 50 वर्ष से कभी मेरी तकबीर ऊ़ला (प्रथम तकबीर) नहीं छूटी तथा ना मैं ने नमाज़ के अवसर पर 50 वर्ष से किसी पुरुष कि गुद्दी --- देखी है।  (यथा हमेशा प्रथम सफ ही में तकबीर ऊ़ला के साथ नमाज़ पढने का सौभाग्य व सुख प्राप्त रहा)। 

 

(हुलयतुल ऑलिया व तबखात अल सुफिया, तबखतुल अहले महीना, सई़द बिन अल मुसैयब, पः 186-187) 

 

यहाँ उदाहरण के रूप में हज़रत सई़द बिन मुसैयब रज़ियल्लाहु तआला अन्हु कि घटना वर्णन की गई।  वरना हमारे सम्पूर्ण किराम तथा प्रिय सालेहीन के जीवन इस प्रकार कि पालन के घटना हैं।  जिन से हमें अपने जीवन को पवित्रता व शुद्धता बनाने का अभ्यास व पाठ मिलता है। 

 

ग़ौर व सकेंद्रित फरमाएं के हज़रत सई़द बिन मुसैयब रज़ियल्लाहु तआला अन्हु कि इस्तेखामत कि क्या स्थिति है।  खुद आप उपर्युक्त फरमा रहे हैं के 50 वर्ष का लम्बा काल गुज़र चुका परन्तु मैं ने की पहली सफ के अलावा जमात के साथ नमाज़ संपादन ना की। 

 

 

जिस के बिना मैं ने कभी अलगी सफ वालों कि गुद्दी नहीं देखी।  50 वर्ष में पीढी बदल जाती है।  सरकार व राज्य बदल जाती है।  यूवक बूढापे को पहुंच जाता है।  परन्तु 50 वर्ष के लम्बी काल में आप के इस्तेखामत का पाये में अंश बराबर अंतर ना आया। 

 

इस प्रकार लम्बे काल में बाजमात नमाज़ के संपादन, प्रथम तकबीर का व्यवस्था, प्रथम सफ में शिरकत निस्संदेह असामान्य रूप से इस्तेखामत कि आईनेदार हैं।  रमज़ान के बाद जीवन को बेहतर व श्रेष्टतर बनाने वालों के लिए तथा परहेज़गारी पर अटल रहने वालों के लिए एक उत्तम व सर्वश्रेष्ठ आदर्श व उदाहरण है।

   
 
 
 
 
 
 
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