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हज़रत आयशा सिद्दीखा की नाखुशी पर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का धीरज रखना

  हज़रत आयशा सिद्दीखा की नाखुशी पर

हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का धीरज रखना

 

भाषांतरः हज़रत आयशा सिद्दीखा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा से वर्णित है फरमाती हैं के रसूलउल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने (एक बार) मुझ से फरमाया के जब तुम मुझ से खुश होती हो तो मुझे इस का ज्ञान हो जाता है और (इसी प्रकार) जब तुम मुझ से नाखुश होती हो तब भी मुझे मालूम हो जाता है मैं ने निवेदन किया के (या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) आप ये कैसे पहचान लेते हैं?  आप ने उत्तर दिया के जब तुम मुझ से खुश होती हो तो कहती हो और इस प्रकार क़स्म खाती हो मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के रब की क़स्म ये बात ऐसी नहीं और जब तुम मुझ से नाखुश होती हो तो इस प्रकार क़स्म खाती हो इबराहीम (अलैहिस सलाम) के रब की क़स्म ये बात ऐसी नहीं है।  (ये सुन कर) मैं ने कहा (आप सहीह फरमाते हैं) अल्लाह तआला की क़स्म या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मैं तो केवल आप का नाम ही नहीं लेती (किन्तु दिल में प्रेम व मुहब्बत बाखी रहती है)। 

 

(इस की रिवायत बुखारी और मुसलिम ने की है)। 

 

स्पष्ट हो के इस हदीस पाक में हज़रत आयशा सिद्दीखा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा की नाखुशी का जो वर्णन है इस से घर-बार के मामलात में दुनयवी नाखुशी तात्पर्य है ना के धार्मिक नाखुशी जिस से ईमान में अंतर (ख़लल) पैदा हो और ये नाखुशी सुकूनों के कारण से होती है जो महिलाओं की फित्री (स्वभाविक) बात है जिस पर शरीअत में गिरफ्त नहीं।  (मिरखात 12)

 

{उद्धरणः नूरुल मसाबीहजिल्द 08}

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