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فتاویٰ > शिष्टाचार > पति-पत्नी के अधिकार

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f:1349 -    पत्नी से 2 वर्ष अलग रहने के बाद क्या विवाह बाखी रहेगा?
Country : मुम्बई,
Name : मुहम्मद वारिस
Question:     अस्सलामु अलैकुम!  आपकी सेवा में निवेदन है के मेरा प्रश्न ये है के पति तथा पत्नी कितने दिन तक अलग रह सकते हैं?  ना इन दोनों में तलाक हुई ना खुलअ़ परन्तु जुदाई का कारण और फिर मिन की स्थिति एक शर्त पर है और वह ये हैके मेरी पत्नी के भाई मेरे बहनोई होते हैं और मैं इन के बहन का पति हुं, दोहरे रिश्ते हैं, लगभग 2 वर्ष पुरानी बात है मेरे भाई जान दुसरा विवाह कर लिए और घर-बार बसर लिए, ना अता-पता था ना खर्चा देना था, मालूम करने पर सच्चाई सामने आई।  

हमारा कहना था के दूसरी पत्नी को छोड दो वरना तुम खुद तुम्हारी बहन को इस के पति से वंचित व महरूम कर रहे हो, 2 वर्ष गुज़र तो गए, ना इन्हों ने दूसरी पत्नी को छोड़ा, ना उन की बहन पति से मिल सकी।  मालूम करना ये है के लगभग 2 वर्ष इतने लम्बे समय की जुदाई विवाह को बाखी रखती हैया नहीं?  सुना है के 4 महीने से अधिक अलग रहने से तलाक़ बई़न हो जाती है, इस मसले का उत्तर प्रदान करें, मैं इस की प्रतीक्षा कर रहा हुँ।
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Answer:     वाअलैकुम अस्सलाम वरहमतुल्लाहि वबरकातुह!  आप ने जो सुना है के पति-पत्नी 4 महीने से अधिक अलग रहने से तलाक बई़न होती है, बिल्कुल गलत है।  जब तक पति तलाक ना दे स्वयं पत्नी से दूसरी प्राप्त करने के कारण से तलाक सचमुच नहीं होती।  यदि आप के बहनोई ने दुसरा विवाह कर लिया है तथा आप की बहन के अधिकार संपादन नहीं कर रहेहों, तो वह शरन अत्याचार करने वाले घोषित पाते हैं जिसका बहुत ही संगीन विपद है।  

पावन शरीअ़त में दुसरा विवाह करने वाले पर ज़िम्मेदारी आती है के वह दोनों पत्नियों के बीच न्याय व इनसाफ करें।  पत्नी के अधिकार में तक बराबरी का अनुसार रखें।  यदि एक पत्नी के पास एक रात गुज़ारता हो तो दूसरी पत्नी के निकट भी एक रात ही गुज़ारे।  

एक पत्नी के पास 2 या 3 रातें गुज़ारता हो तो दूसरी के पास भी उसी संख्या में रहे।  जो व्यक्ति पत्नियों के बीच न्याय स्थापित ना रखे क़यामत के दिन इसका एक भाग गिरा हुआ रहेगा।  

जैसा के सुनन तिरमिज़ी में हदीस पाक हैः-

भाषांतरः- हज़रत सैयदना अबु हुरैरह रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु से वर्णित है के हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम ने आदेश फरमायाः जब मनुष्य के पास 3 पत्नी हों तथा वे इन के बीच न्याय ना करे तो क़यामत के दिन इस स्थिति में आएगा के उस का एक भाग गिरा हुआ होगा।  

(सुन तिरमिज़ी, किताबुल निकाह, हदीस संख्याः 1171)  

अर्थात पति को चाहिए के अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास व अनुभूति करते हुए दोनों पत्नियों के अधिकार संपादन करें एवं अधिकार के समापन में बराबरी को पेश नज़र रखे।  

आप अपनी बेहनोई को उच्चता के साथ समझाएं।  परिवार के बुद्धिमान व बड़े सदस्य के साथ मुलाकात करवाएं।  जैसा के फतावा आलमगिरी, किताबुल निकाह में है।  

आप ने 2 वर्ष से अपनी पत्नी (आप के बहनोई की बहन) से जो अलग रहना प्राप्त कर लिया है, ये कर्म श्रेष्ठ नहीं।  इसी प्रकार आप ने अपने बहनोई के लिए जो शर्त रखी है के आप दूसरी पत्नी को छोड़ दें वरना आप की बहन अपने पति से वंचित व महरूम हो जाएगी।  ये इसलामी तरीक़ा नहीं।  

आप अपनी बहन के अधिकार की मांग कर रहे हैं, अधिकार प्राप्त ना होने की स्थिति में अपनी पत्नी को इस की गलती के बिना अधिकार से वंचित करने की धमकी देते हैं, भाई की गलती का बदला एवं इस के अत्याचार का प्रतिशोध इस की बहन से लेना स्वंय खुद अत्याचार है।  अपने प्रणाली व तरीक़े को बदलें, अपनी पत्नी के साथ शिष्टाचार करें तथा अधिकार संपादन करें।  और जाइज़ तरीक़े से बहनोई को समझाएं।  

जैसा के फतहुल खदीर, किताबुल निकाह में आया है।  

{और अल्लाह तआ़ला सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है,

मुफती सैय्यद ज़िया उद्दीन नक्षबंदी खादरी

महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया,

प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर}
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