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فتاویٰ > क़ुरआन करीम

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f:1317 -    ग़ैर-मुस्लिम को क़ुरान तोहफा देना कैसा है?
Country : वरंगल, भारत,
Name : मुहम्मद सलाह उद्दीन
Question:     हमारे कार्यालय में कुछ ग़ैर-मुस्लिम सदस्य इसलाम धर्म से उत्तेजना रखते हैं और क़ुरान मजीद पढने की बावना प्रकट करते हैं।  इन को क़ुरान की शिक्षा देना कैसा है?  क्या इन्हें क़ुरान करीम तोहफे व उपकार विशेष रूप से दिया जा सकता है?
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Answer:     यदि इन ग़ैर मुस्लिम सदस्य से शिष्टाचार व आदर करने का विचार हो तो हिदायत की नियत से इन्हें क़ुरान मजीद दिया जा सकता है।  एवं इस की शिक्षा भी दी जा सकती है।  साथ ही साथ इन्हें ये भी बता दिया जाए के नहा-धोकर इस को हाथ लगाएं।  जैसा के फतावा आलमगिरी जिल्द 5, किताबुल कराहियह में है।  

ग़ैर-मुस्लिमों को क़ुरान की शिक्षा देने में कोई समस्या नहीं है तथा यदि इन की ओर से अनादर व उपेक्षा का संकट हो तो इन्हें क़ुरान नहीं देना चाहिए।  क्यों के क़ुरान मजीद का आदर व सम्मान हर रूप में अनिवार्य व अवश्य है तथा इस असम्मान व असभ्यता से बचाना इ़मानी अपेक्षा है।  अर्थात सहीह मुस्लिम में हदीस पाक वर्णन हैः-

भाषांतरः- हज़रत अबुदल्लाह बिन उ़मर रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु से वर्णित है के सरकार पाक सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम ने क़ुरान करीम को विरोधियों की धरती व भूमि पर ले जान से मना किया।  इस आशंका से के कहीं विरोधी के हाथ ना पढ़ जाए (संकेत है के वह इस का अनादर व असभ्यता कर बैठें)।  

(सहीह मुसलिम, हदीस संख्याः 4947)  

यदि इस का सम्मान व आदर को पेश नज़र रखते हैं तो इन्हें क़ुरान देने में कोई समस्या नहीं जैसा के क़ुरान व हदीस से स्पष्ट हो चुका।  

{और अल्लाह तआ़ला सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है,

मुफती सैय्यद ज़िया उद्दीन नक्षबंदी खादरी

महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया,

प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर}
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