***** For other Fatawa, please click on the topics on the left *****



विषय की सूची

فتاویٰ > इबादत > हज्ज का विवरण

Share |
f:1207 -    हरमैन शरीफ के शिष्टाचार से संबंधित एक अवश्य मार्गदर्शन
Country : आग़ा पुरा, हैद्राबाद,
Name : मुहम्मद फारूख
Question:     हज्ज व उम़रे के समय देखने में आता है के लोग मसजिद नबवी से निकलते समय अपनी चप्पल आदि इस प्रकार धरती पर ड़ालते हैं के इस के कारण से कापी आवाज़ होती है।  क्या ये तरीक़ा श्रेष्ठ है?  किसी भी मसजिद में चप्पल आदि पटकना विशेषकर मसजिद नबवी में इस प्रकार का कर्म कैसा है?  

और ये भी देखने में आता है के कुछ ज़ियारत करने वाले मसजिद नबवी में अपनी किसी अभिज्ञेय व पहचानत वाले को देखते हैं तो इसे दूसरे अवाज़ देते हैं।  इस बारे में कु़रान व हदीस के आधार में अनुदेश करें तो कृपा होगी?
............................................................................
Answer:     किसी भी कार्य को विश्राम व सम्पर्क और प्रतिष्ठा के साथ करना चाहिए।  उपेक्षा व असावधानी तबियत के लिए पसंद नहीं।  हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम सम्पूर्ण कार्य को विश्राम व सहजभाव के साथ परिणाण देते।  अर्थात सहीह मुसलिम जिल्द 1, किताबुल जनाइज़ पः 313, में लम्बी रिवायत का एक भाग दर्शन करें-

भाषांतरः- उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीखा रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु फरमाते हैं, हज़रत रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम ने आहिस्ता से अपनी चादर मुबारक ली, विश्राम से धन्य नअ़लैन पहनी, आहिस्ते दरवाज़ा खोल करबाहर तशरीफ ले गए फिर आहिस्ता से दरवाज़ा बंद किया।  

(सहीह मुसलिम, किताबुल जनाइज़, पः 313, हदीस संख्याः 974)  

किसी अवसर पर चप्पल आदि पटक़ना या धरती पर इस प्रकार से जोर से रखना के जिस से आवाज आए अनुचित व अप्रिय है।  एवं मसजिदों से निकलते समय ये कर्म जितने सम्भव हो अप्रिय व अनुचित है।  मसजिद में प्रवेश होते समय निकलते और भीतर मसजिद इस के शिष्टाचार व सभ्याचार को ध्यान में रखना चाहिए।  ऐसी कोई अवाज़ ना की जाए जिस से नमाज़ियों और ज़िक्र वतिलावत करने वालों को बाधा व उत्तेजना हो।  

अर्थात चप्पल आदि रखते समय आहिस्तगी व विश्राम को पेश नज़र रखना चाहिए।  ये साधारण मसजिद के प्रावधान व अहकाम हैं एवं विशेषकर मसजिद नबवी सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम तथा मसजिद हराम के शिष्टाचार व सभ्याचार तो अन्य मसजिदों के समान अधिक हैं इस लिए हाजी लोग व ज़ियारत करने वालों को चप्पल पहनते समय एवं रखते समय इन पावन स्थान का सम्मान व आदर ध्या रखते हुए इस प्रकार असावधानी व उपेक्षा से सम्पूर्ण रूप से सावधान रहना चाहिए के कहीं ये कर्म से असभ्यता व अनादर पाकर लोक व परलोक में परेशानी ना उठाना पड़े।  

अब रहा मसजिद नबवी शरीफ में किसी दूसरे को अवाज़ के साथ पुकारना तो कठिन निषिद्ध एवं सभ्याचार के विरुद्ध है।  ये वह पावन मसजिद हैं जहाँ हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम का पावन रौज़ा है।  सभ्याचार व सभ्यता के साथ उपस्थित होना चाहिए।  

ये वो उच्च दरबार है जहाँ ऊंची आवाज करने से मना व वर्जित किया गया एवं ऊंची आवाज करने का आदेश ये बै के सम्पूर्ण कर्म व इ़बादतें व्यर्थ व बरबाद हो जाते हैं तथा मनुष्य को इस का एहसास अभिज्ञता भी नहीं रहता जैसा के दरबार रिसालत सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के सभ्याचार की शिक्षा में अल्लाह तआ़ला का आदेश हैः

भाषांतरः- ऐ इ़मानवालो!  तुम अपनी आवाज़ों को नबी (सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम) की आवाज़ पर बुलंद मत करो एवं आप की सेवा में इस प्रकार वार्तालाप करो जिस प्रकार तुम एक दूसरे से वार्तालाप करते हो वरना तुम्हारे कर्म अकारथ व व्यर्थ हो जां गे और तुम्हें इस की सूचना ना होगी।  

(सुरह अल हुजुरातः 49:02)  

हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के धन्य देहान्त के बाद भी यही आदेश है के मसजिद नबवी शरीफ में आवाज बुलंद ना की जाए।  अर्थात सहीह बुखारी जिल्द 1, पः 67 में है।  

भाषांतरः- हज़रत सायब बिन यज़ीद रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु से वर्णित है इन्हों ने फरमाया मैं मसजिद नबवी में खडा हुआ था तो एक साहब ने मेरी ओर कंकरी फैंक कर ध्यान लिया।  मैं ने देखा के हज़रत उ़मर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु हैं, आप ने इशारा दिया के इन दो पुरुषों को मेरे पास ले आओ!  तो मैं इन दोनों को ले कर आप के पास पहुंचा।  

हज़रत उ़मर रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु ने फरमायाः यदि तुम इस नगर के रहने वाले होते तो मैं अवश्य तुम्हें सजा देता, तुम रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम की मसजिद में अपनी आवाज़ बुलंद करते हो?  

(सहीह बुखारी, जिल्द 1, पः 67, हदीस संख्याः 470)  

सैय्यदी शेखुल इसलाम इ़माम मुहम्मद अनवारुल्लाह फारूखी रहमतुल्लाहि अलैह इस हदीस की शरह करते हुए लिखते हैः इस सूचना से स्पष्ट है के मसजिद शरीफ में कोई आवाज़ बुलंद नहीं कर सकता था एवं यदि करता तो दण्ड के योग्य समझा जाता था।  

बावजूद ये सायब बिन यज़ीद चंदां दौर ना थे।  परन्तु इसी सभ्याचार से उ़मर रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु ने इन को पुकारा नहीं बल्कि कंकडी फैंक कर अपनी ओर ध्यान किया।  ये सम्पूर्ण सभ्याचार इसी कारण से ते के आप हज़रत सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम बातिनी रूप से वहाँ तशरीफ रखते हैं क्यों के यह मसजिद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम यदि लिहाज़ केवल मसजिद का होता तो अहले ताइ़फ भी माननीय ना रखी जाते क्यों के वहाँ भी मसजिदे थी।  

अ़ल्लामा अबु फज़्ल खाज़ी अयाज़ रहमतुल्लाहि अलैह, शिफा शरीफ में दरबार नबवी सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के सभ्याचार विस्तार से वर्णन करने के बाद के सभ्याचार विस्तार से वर्णन करने के बाद पः 251 में लिखते हैः-

भाषांतरः- ये बात ध्यान में रख लो के हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के दरबार में सभ्यता रहना सम्मान करना जिस प्रकार पावन देहान्त से पूर्व अनिवार्य था देहान्त करने के बाद भी अनिवार्य व अवश्य है।  प्रत्येक इ़मानवाले पर अनिवार्य है के जब आप का मुबारक ज़िक्र करे या सुने तो जहाँ तक हो सके खुशू व खुज़ू का प्रदर्शन करे।  अपने कथन व चलन में सभ्याचार के साथ रहे।  आप का सम्मान व आदर को ध्यान में रखे एवं अल्लाह तआ़ला के आदेश एवं संबंध के अनुसार सभ्यता के साथ रहे।  क्यों के वह पावन सेवा में उपस्थित है।  

अल्लामा अबु अल फज़्ल खाज़ी अयाज़ रहमतुल्लाहि अलैह फरमाते हैं हमारे सलफ सालेहीन एव बुज़ुर्ग इ़माम का यही तरीक़ा रहा।  

(अश शिफा तअ़रीफ हुक़ूक़ुल मुसतफा, पः 251)  

मदीने में ज़ियारत करने वाले पावन रौज़े को इन सभ्यता का अनुसार रखना चाहिए।  किसी को मसजिद नबवी शरीफ में बुलंद आवाज़ से ना पुकारें और अपने सम्पूर्ण चलन व हरकतों में से कोई ऐसी हरकत परिणाम नहीं होनी चाहिए जिस में असभ्यता व निरादर के प्रदर्शन का संदेह भी हो।  

{और अल्लाह तआ़ला सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है,

मुफती सैय्यद ज़िया उद्दीन नक्षबंदी खादरी

महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया,

प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर}
All Right Reserved 2009 - ziaislamic.com