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f:2201 -  क़व्वाली का आदेश > Back
Question
क़व्वाली सुनना कैसा है?
Answer
जो लोग लहु व लअब से दूर, व्यर्थ कामों से दूर हों, बेफायदा कामों की ओर ध्यान नहीं रखते, धन्य शरीअत के पाबंद, तक़वा व धर्मनिष्ठ हों, उन के लिए क़व्वाली सुन्ने के कुछ शर्तें हैं। जैसा के जामिया निज़ामिया के प्रथम मुफती हज़रत मुफती मुहम्मद रुक्न उद्दीन रहमतुल्लाहि अलैह ने वर्णन कियाः (1)- उन बुज़ुर्गों की जमात में गाते समय कोई बिना दाढ़ी वाले पुरुष ना हों। (2)- सम्पूर्ण एक ही लिंग और एक ही मशरब (सिलसिला) के लोग हों तथा इन की मेहफिल में दुनियादार व सांसारिक लोग से कोई ना हों, तथा ना कोई फासिख यानी बदकार और ना कोई महिला हो। (3)- गाने वाला अल्लाह तआला के लिए गाए और उस की उजरत व मज़दूरी या खाने की उम्मीद व इच्छा ना हो। (4)- ये धर्मनिष्ठ व बुज़ुर्गवार गाने के स्थान में खाना खाने के लिए या कोई फुतूहात प्राप्त करने के लिए जमा ना हुए हों। (5)- गाने की मेहफिल में जब वज्द की स्थिति में खड़े हो जाएँ तो हाल के प्रभाव (मग़लूब-उल-हाल) यानी बेखुद हो कर खड़े हों। (6)- उसी वज्द को प्रकट करें जो सच्चा हो। जो तक़वा वाले लोग, परहेज़गार वालों उपर्युक्त वर्णन शर्तें पाई जाएँ उन के लिए क़व्वाली सुनना शरन मुबाह व जायज़ है और जो लोग इस के अधिकारी व योग्य ना हों उन्हें क़व्वाली सुनने से दूर रेहना चाहिए। {और अल्लाह तआ़ला सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है, मुफती सैय्यद ज़िया उद्दीन नक्षबंदी खादरी महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया, प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर}

 

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