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f:2187 -  मसजिद नबवी में आवाज बुलंद करने की निषिद्ध > Back
Question
मसजिद नबवी में आवाज बुलंद करने की निषिद्ध के विषय में कोई हदीस वर्णन करें?
Answer
मसजिद नबवी में किसी को दूर से बुलंद आवाज के साथ पुकारना कठिन निषिद्ध तथा अदब के विरुद्ध है यह वह पावन व उच्च मसजिद है जहाँ हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम का पावन रौज़ा है। अदब के पैकर हो कर उपस्थित होना चाहिए। यह वह उच्च दरबार है जहाँ बुलंद आवाज करने से मना किया गया तथा आवाज बुलंद करने का आदेश यह है के सम्पूर्ण कर्म व इ़बादतें व्यर्थ व बर्बाद हो जाती हैं। तथा मनुष्य को इस की समझ भी नहीं रहती जैसा के दरबार रिसालत सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के शिष्ठाचार व सभ्याचार की शिक्षा में अल्लाह तआ़ला का आदेश हैः- भाषांतरः- ऐ इ़मान वालो! तुम अपनी आवाज़ों को नबी अकरम (सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम) की आवाज़ से बुलंद मत करो तथा आप की सेवा में इस प्रकार वार्तालाप मत करो जिस प्रकार तुम एक-दूसरे से वार्तालाप करते हो वरना तुम्हारे कर्म व्यर्थ व अकारथ हो जाएंगे तथा तुम्हें इस की ख़बर भी ना होगी। (सुरह अल हुजुरातः 49:02) हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के मुबारक देहान्त के बाद भी यही आदेश है के मसजिद नबवी शरीफ में आवाज बुलंद ना की जाए। अर्थात सहीह बुखारी शरीफ, जिल्द 1, किताबुस सलात में हदीस पाक हैः- भाषांतरः- हज़रत सायब बिन यज़ीद रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु से वर्णित है इन्हों ने फरमाया में मसजिद नबवी में खडा हुआ था तो एक व्यक्ति ने मेरी ओर कंकणडी पैंक ध्यान किया, मैं ने देखा के हज़रत उ़मर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु हैं आप ने इशारा दिया के इन दो पुरुषों को मेरे पास ले आओ। तो मैं इन दोनों को ले कर आप के पास पहुंचा। हज़रत उ़मर रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु ने फरमायाः तुम किस क़बीले के हो? या फरमायाः तुम किसी इलाक़े के नागरिक हो? इन दोनों ने निवेदन कियाः हम ताई़फ के नागरिक हैं आप ने फरमायाः यदि तुम इस नगर के रहने वाले होते तो मैं अवश्य तुम्हें सज़ा देता तुम हज़रत रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम की मसजिद में अपनी आवाज बुलंद करते हो? सैयदी शेखुल इसलाम इ़माम मुहम्मद अनवारुल्लाह फारूखी रहमतुल्लाहि अलैह इस हदीस पाक के अनुवाद करते हुए लिखते हैः- भाषांतरः- इस सूचना से स्पष्ट है के मसजिद में कोई आवाज बुलंद नहीं कर सकता था तथा यदि करता तो सजा के योग्य समझा जाता था बावजूद यह के साइब बिन यज़ीद अधिक दूर ना थे। किन्तु इसी शिष्ठाचार व सभ्याचार से उ़मर रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु ने इन को पुकारा नहीं बल्कि कंकडियां फैंक कर अपनी ओर ध्यान किया। यह सम्पूर्ण शिष्ठाचार व सभ्याचार इसी कारण से थे के आप हज़रत सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम जीवित स्थिति वहाँ तशरीफ रखते हैं। क्यों के यदि लिहाज़ केवल मसजिद होने का होता तो “फी मसजिद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम” कहने की कोई आवश्यकता ना थी। दुसरा सबूत यह है के इस सजा को अहल बलद के लि विशेष फरमाया जिन को मसजिद शरीफ के शिष्ठाचार व सभ्याचार अच्छी प्रकार से मालूम थे यदि केवल मसजिद ही का लिहाज़ होता तो अहले ताई़फ भी मआ़जू़र ना रखे जाते क्यों के अंत में वहाँ भी मसजिदें थीं। (अनवारुल अहमदी, पः 264/265) अ़ल्लामा अबु अल फज़्ल खाज़ी अयाज़ रहमतुल्लाहि अलैह शिफा शरीफ में दरबार नबवी सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के आदाब विस्तार में वर्णन करने के बाद अल बाबुल सालिस फी तअ़ज़ीम उ़मरह व वुजूब तो खैरह व बर्रह पः 251 पर लिखते हैः- भाषांतरः- हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के दराबर में आदर व सम्मान व सम्मानपूर्वक से रहना जिस प्रकार पावन देहान्त से पूर्व अनिवार्य था देहान्त फरमाने के बाद भी अनिवार्य व अवश्य है। हर इ़मान वाले पर अनिवार्य है के जब आप का ज़िक्र मुबारक करे या सुने तो जितना हो सके खुशू व खुज़ू का प्रदर्शन करें अपने कर्म व हरकतों में अदब को रखें। आप की महिमा व वैभव को लिहाज़ रखे तथा अल्लाह तआ़ला के आदेश तथा शिक्षा के अनुसार अदब से रहें क्यों के वह पावन सेवा में उपस्थित है। अल्लामा अबु अल फज़्ल खाज़ी अयाज़ रहमतुल्लाहि अलैह फरमाते हैं हमारे सलफ सालेहीन तथा पूर्वज इ़मामों का यही तरीक़ा है। धन्य मदीने में रौज़े के ज़ियारत करने वालों को इन शिष्टाचार व सभ्याचार का लिहाज़ रखना चाहिए। किसी को मसजिद नबवी में बलुंद आवाज से ना पुकारें तथा अपने सम्पूर्ण हरकतों व गतिविधि में से कोई ऐसी हरकत समापन नहीं होनी चाहिए जिस में अनादर व अशिष्ठता का प्रदर्शन हो। अल्लाह तआ़ला के दरबार में दुआ़ है के सरकार पाक सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के वसीले से हम सब को पावन मदीने में उपस्थित होने की कृपा प्रदान करें। तथा धन्य दरबार में शिष्ठाचार व सभ्याचार के साथ उपस्थित होना भाग्य में फरमाएं। मृत्यु आए तो आप (सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम) के पावन शहर में आए तथा जन्नतुल बखीअ़ शरीफ में दफन होना भाग्य में हो। {और अल्लाह तआ़ला सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है, मुफती सैय्यद ज़िया उद्दीन नक्षबंदी खादरी महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया, प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर}

 

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