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  धर्म का इतना ज्ञान प्राप्त करना जिस से धर्म श्रेष्ठ हो - प्रत्येक मुसलमान पर फर्ज़ है
   
 

 धर्म का इतना ज्ञान प्राप्त करना जिस से धर्म श्रेष्ठ हो-

प्रत्येक मुसलमान पर फर्ज़ है 

बन्दा कलिमे तैयिबा ला इलाहा इलल्लाहु मुहम्मदुर रसूलउल्लाह पढ़ कर अपने रब से इक़रार करता है के मैं आप का गुलाम हुँ तथा आप के सम्पूर्ण अहकाम व प्रावधान पर अमल करुँगा एवं जिन जिन चीज़ों से मना किया गया है उन से दूर रहुँगा। 

 

किन्तु हम को अल्लाह तआला के प्रावधान व अहकाम पर चलने के लिए मालूम ना था के वह कौन से कर्म हैं?  ये प्रावधान हज़रत मुहम्मद रसूलउल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से मालूम हुए हैं।  इस कारण से हम इक़रार करते हैं के आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बतलाए हुए तरीक़ों से अल्लाह तआला की बन्दगी करेंगे तथा आप को अल्लाह तआला के बन्दे और सत्य रसूल मानेंगे। 

 

इस प्रकार आप की आज्ञापालन अल्लाह तआला की आज्ञापालन है, तथा आप से मुहब्बत रखना अल्लाह तआला से मुहब्बत रखना है।  इस के विरुद्ध करने वाला अल्लाह तआला का प्रिय एवं प्यारा तथा सिरातल-मुस्तक़ीम पर चलने वाला कभी भी नहीं हो सकता।  इस लिए हम पर ज्ञान का सीखना भी फर्ज़ है। 

 

अल्लाह तआला फरमाता है के प्रत्येक घर का दरवाज़ा रेहता है इस में उसी से प्रवेश होना चाहिए, ज्ञान का दरवाज़ा उलेमा-हक़ (सच्चे विद्वान) हैं।  उन से ज्ञान प्राप्त करने की अवश्यकता है।  जो लोग ऊर्द भाषांतर देख कर या अरबी भाषा में धर्म का ज्ञान प्राप्त किए बिना क़ुरान व हदीस फेहमी की बात करते हैं वह गलती पर हैं। 

 

काश!  ये अज्ञानी ही रेहती हैं तथा अपनी राय का क़ुरान पाक व धन्य हदीस में दखल ना देते तो श्रेष्ठतर था। 

 

हदीस पाक में आया है के धर्म का एक मसला सीखना पहाड़ के बराबर धन व ज़र खैरात करने से श्रेष्ठतर व उच्च है।  ज्ञान सीने शिफा बन कर प्रवेश होगा तथा नूर बन कर निकलेगा।  जो व्यक्ति ज्ञानी व विद्वानों की मजलिस में शरीक हो कर अल्लाह तआला का कलाम सुन कर इस पर अमल करता है अल्लाह तआला उस को 6 नेअमतें प्रदान करता हैः-

 

(1)- हलाल रिज़्ख। 

(2)- क़ब्र के अज़ाब से मुक्ति। 

(3)- कर्म पत्र दाहिने हाथ में पाना। 

(4)- पुल-सिरात से बिजली की तरह गुज़रने की आसानी। 

(5)- पैगम्बरों के साथ हशर। 

(6)- सुर्क़ या खौत का 40 दर्जों वाला महल जन्नत में। 

 

हदीस पाक में आया है के ज़माना ऐसा आएगा के लोग ज्ञानियों व विद्वानों की बेक़द्री (अनादर) करेंगे, उस समय वह 3 प्रकार की बलाउँ में फंसेंगेः-

 

(1)- रोज़ी में बरकत ना रहेगी। 

(2)- उन पर अत्याचारी हाकिम नियुक्त कर दिया जाएगा। 

(3)- दुनिया से बेईमान जाएँगे। 

 

ईमान सलामत रखने के लिए अवश्य है के धर्म की शिक्षा प्राप्त की जाए।  यदि ये ना हो सके तो विद्वानों व ज्ञानियों की संगत व सोहबत या अल्लाह वाले इस की बदल है।  ये भी ना हो सके तो धार्मिक पुस्तकों का पढ़ना ग़नीमत है।  परन्तु इस की क्षमता पैदा होने तक विद्वानों की सोहबत अवश्य है। 

 

हज़रत सैयदना ईसा बिन मरयम अलैहिस सलाम आदेश करते हैः

 

जो व्यक्ति अपने शरीर व धन पर कठिनाई आने से इस उम्मीद से खुश हो के इस के द्वारा अपने पापों व गुनाहों का कफ्फारह व प्रायश्चित होगा, तो वह व्यक्ति ज्ञानी व विद्वान (आलिम) है। 

 

 

{मवाईज़ हसना, लेखकः हज़रत अबुल हसनात मुहद्दिसे-देक्कन रहमतुल्लाहि अलैह, जिल्द 01, पः 266/267}

   
 
 
 
 
 
 

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