CI: 169   
टब में खून गिर जाए तो क्या आदेश है?
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  CI: 168   
छाती और पीठ के बाल निकालने का आदेश
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  CI: 167   
हेलो (Hello) के 2 अर्थ और इन का आदेश
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  CI: 166   
सूर्य ग्रहण की नमाज़ का आदेश
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  CI: 165   
क्या महिलाओं का फैशियल कराना जायज़ है?
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  CI: 164   
खादियानी से कुरबानी का गोश्त लेना ?
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  CI: 163   
क़ुरबानी के दिन और समय
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  CI: 162   
कर्जदार के लिए क़ुरबानी का आदेश
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  CI: 161   
ऑनलाइन क़ुरबानी का आदेश
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  CI: 160   
अमरीका एवं अन्य देशों में नागरिक सदस्यों की भारत में क़ुरबानी
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  CI: 159   
जानवर के कौनसे अंग व भाग खाना श्रेष्ठ नहीं
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  CI: 158   
जानवर के पैर में घाव आए तो क़ुरबानी का आदेश
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  CI: 157   
दंतहीन जानवर की क़ुरबानी का आदेश
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  CI: 156   
धनवान बच्चों पर क़ुरबानी ?
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  CI: 155   
व्यापारिक लोगों पर क़ुरबानी
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  CI: 154   
इंटरनेट पर गपशप (चैटिंग) का इसलामी आदेश
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  CI: 153   
स्त्री व महिला का नौकरी करने का आदेश
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  CI: 152   
चीटियों को मारने का शरई आदेश
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  CI: 151   
कुत्ता पालने का शरई आदेश
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  CI: 150   
महिला का होटल और पार्कों में जाने का आदेश
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CI 166- सूर्य ग्रहण की नमाज़ का आदेश

 सूर्य ग्रहण की नमाज़ का आदेश

 

सूर्य ग्रहणअल्लाह तआ़ला के लक्षण व निशानियों में एक निशानी है।  अज्ञानता के दौर में लोगों का ये दृष्टिकोण था के सूर्य ग्रहणतथा चंद्र ग्रहणकिसी बड़ी व्यक्तित्व के देहान्त के कारण से होते हैं।  सरकार पाक सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम ने इस निर्मूल व निराधार दृष्टिकोण की मना करते हुए, मजमअ़ उज़ ज़वाईद, (हदीस संख्याः 3263) में हदीस पाक वर्णन हैः- 

भाषांतरः- हज़रत महमूद बिन लविद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से वर्णित है इन्हों ने फरमाया जिस दिन हज़रत नबी अकरम सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के नंदन हज़रत इब्राहीम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का देहान्त हुआ सूर्य ग्रहण लग गया तो लोगों ने कहा हज़रत रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम के नंदन हज़रत इब्राहीम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के देहान्त के कारण से सूर्य ग्रहण हुआ तो हज़रत रसूल पाक सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम ने निर्देश कियाः निश्चय सूर्य तथा चंद्र अल्लाह तआ़ला की निशानियों में से दो निशानियां हैं।  सुनो!  सत्य ये है के इन्हें किसी की मृत्यु या जीवन के कारण से ग्रहण नहीं लगता, जब तुम इन दोनों को इस प्रकार ग्रहण में ज्योतिहीनता (बिना रोशनी) देखो तो मसजिदों की ओर ध्यान हो जाओ।  फिर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआ़ला अलैहि वसल्लम नमाज़ के लिए खड़े हुए तथा आप ने सुरह ज़ारियात का कुछ भाग तिावत किया फिर रुकू किया फिर आप रुकू से उठ कर सीधे खड़े हुए फिर दो सजदे किए फिर खियाम किया तथा प्रथम रकात के प्रकार दूसरी रकात संपादन की।  

(मजमअ़ उज़ ज़वाईद, जिल्द 02, किताबुस सलात, पः 445 / मुसनद इमाम अहमद, मुसलद उल अनसार रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, हदीस संख्याः 22522)  


कुसूफ की नमाज़ अनुकूलता से सुन्नत है तथा जमात से संपादन करना सुन्नत किफायह है।  कुसूफ की नमाज़ की दो रकातें हैं।  जो बिना अज़ान व इखामत, ग़ैर मकरूह समय में जमात से संपादन की जाती है।  

इस नमाज़ में लम्बी खिरात करना सर्वोत्तम है।  प्रथम रकात में सुरह बक़रह की संख्या तथा दूसरी रकात में सुरह आले इ़मरान की संख्या में तिलावत की जाए।  

कुसूफ की नमाज़, इमाम अबु यूसुफ रहमतुल्लाहि अलैह तथा एक लोकोक्ति में इमाम मुहम्मद रहमतुल्लाहि अलैह के पास जेहरी खिरात से संपादन की जाए।  नमाज़ के बाद इस समय तक इमाम तथा मुखतदी सामूहिक रूप से दुआ़ में व्यस्त रहें जब तक ग्रहण समाप्त ना हो जाएं।  

जैसा के रद्दुल मुहतार, बाबुल कुसूफ, जिल्द 01, पः 622 में उल्लेख है।  

तथा अधिक फतावा आलमगिरी, किताबुस सलाह एवं अल बहरुर राई़ख में भी उल्लेख है।



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