CI: 169   
टब में खून गिर जाए तो क्या आदेश है?
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  CI: 168   
छाती और पीठ के बाल निकालने का आदेश
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  CI: 167   
हेलो (Hello) के 2 अर्थ और इन का आदेश
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  CI: 166   
सूर्य ग्रहण की नमाज़ का आदेश
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  CI: 165   
क्या महिलाओं का फैशियल कराना जायज़ है?
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  CI: 164   
खादियानी से कुरबानी का गोश्त लेना ?
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  CI: 163   
क़ुरबानी के दिन और समय
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  CI: 162   
कर्जदार के लिए क़ुरबानी का आदेश
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  CI: 161   
ऑनलाइन क़ुरबानी का आदेश
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  CI: 160   
अमरीका एवं अन्य देशों में नागरिक सदस्यों की भारत में क़ुरबानी
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  CI: 159   
जानवर के कौनसे अंग व भाग खाना श्रेष्ठ नहीं
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  CI: 158   
जानवर के पैर में घाव आए तो क़ुरबानी का आदेश
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  CI: 157   
दंतहीन जानवर की क़ुरबानी का आदेश
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  CI: 156   
धनवान बच्चों पर क़ुरबानी ?
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  CI: 155   
व्यापारिक लोगों पर क़ुरबानी
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  CI: 154   
इंटरनेट पर गपशप (चैटिंग) का इसलामी आदेश
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  CI: 153   
स्त्री व महिला का नौकरी करने का आदेश
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  CI: 152   
चीटियों को मारने का शरई आदेश
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  CI: 151   
कुत्ता पालने का शरई आदेश
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  CI: 150   
महिला का होटल और पार्कों में जाने का आदेश
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CI 156- धनवान बच्चों पर क़ुरबानी ?

 धनवान बच्चों पर क़ुरबानी ?

 

कुछ नाबालिग़ बच्चों के नाम पर अधिक मात्रा व बड़ी संख्या में राशि होती है क्या इस के कारण से बच्चों पर क़ुरबानी वाजिब होगी या माता-पिता के धन से इस की ओर से क़ुरबानी करनी चाहिए?  इस से संबंधित फुक़्हा किराम के 2 कथन हैः-

 

(1)- फिक़्ह व फतावा कि पुस्तकों में सामान्य रूप से ये स्पष्टीकरण मलिता है के नाबालिग यदि धनवान व मालदार हो तो इस पर क़ुरबानी वाजिब है। 

 

(2)- अल्लामा इब्न आबिदीन शामी रहमतुल्लाहि अलैह ने रद्दुल मुहतार में नाबालिग पर क़ुरबानी वाजिब व अनिवार्य ना होने को प्रामाणिक व शासनानुरूप कथन व राय घोषित किया है, तथा शरई सिद्धान्त व उसूल इस की चेतावनी करते हैं के इबादतों व वाजिब होने की एक शर्त बालिग़ होना है। 

 

जब तक बच्चा नाबालिग रहता है शरीतअ के सिद्धान्त उस पर लागू नहीं होते, पावन सरीअत उसे किसी ज़िम्मेदारी का पाबंद नहीं घोषित देती।  उपर्युक्त वर्णन नाबालिग पर नमाज़, रोज़ा, ज़कात तथा हज्ज के प्रकार क़ुरबानी भी वाजिब नहीं।  धन क्यों के लड़के की मिलकियत है।  अर्थात माता-पिता को रवा नहीं के वह नाबालिग लड़के की ओर से क़ुरबानी के लिए इस का धन व माल खर्च करें। 

 

जैसा के दुर्रे मुक़तार, जिल्द 05, हदीस संख्याः 223 में उल्लेख हैः-

 

भाषांतरः पिता के लिए रवा नहीं के वह अपने नाबालिग लड़के के धन से क़ुरबानी करे, यही अनुसार के योग्य तथा प्रामाणिक व शासनानुरूप कथन व राय है। 

 

इसी प्रकार बच्चों की ओर से माता-पिता या संरक्षण लोग का अपने धन से क़ुरबानी करना शरन वाजिब व अनिवार्य नहीं यदि माता-पिता इन की ओर से क़ुरबानी करें तो प्रशंसनीय व संस्ताव्य (मुसतहब व मुसतहसन) है। 

 

जैसा के रद्दुल मुहतार, जिल्द 05, पः 222 में उल्लेख हैः-

 

भाषांतरः पिता पर अपनी औलाद की ओर से क़ुरबानी करना वाजिब व अनिवार्य नहीं, ज़ाहिर उर रिवायह में है के औलाद की ओर से क़ुरबानी करना मुसतहब (प्रशंसनीय) है, वाजिब नहीं, सदखे फित्र असमान के (के वह औलाद की ओर से पिता पर वाजिब है तथा फतना इसी पर है)।

 

{और अल्लाह तआ़ला सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है,

 

मुफती सैय्यद ज़िया उद्दीन नक्षबंदी खादरी

 

महाध्यापक, धर्मशास्त्र, जामिया निज़ामिया,

 

प्रवर्तक-संचालक, अबुल हसनात इसलामिक रीसर्च सेन्टर}



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